बोशाली सिन्हा, साक्षात्कार
DIAL 1975 में बतौर Production Designer काम करना मेरे लिए सिर्फ एक फिल्म का हिस्सा बनना नहीं, बल्कि एक पूरे दौर को दोबारा रचने और उसे पर्दे पर जीवंत करने का बेहद खास अनुभव था। फिल्म के लिए आपातकाल (Emergency) के दौर के लखनऊ को पुनः निर्मित करना एक बड़ी रचनात्मक चुनौती थी। मेरा प्रयास था कि दर्शक केवल कहानी न देखें, बल्कि हर फ्रेम में उस समय के लखनऊ को महसूस करें।
प्रोडक्शन डिज़ाइन के स्तर पर लोकेशन, वास्तुशिल्प, सरकारी और निजी स्थानों की बनावट, दीवारों के रंग और टेक्सचर, पुराने फर्नीचर, प्रॉप्स, साइनेज, पोस्टर्स, दस्तावेज़ और उस समय की छोटी-छोटी दृश्यात्मक बारीकियों पर विशेष ध्यान दिया गया। मेरी कोशिश थी कि 1975 का लखनऊ सिर्फ “पुराना” दिखाई न दे, बल्कि उस दौर की सामाजिक और राजनीतिक बेचैनी, उसका वातावरण और उसकी अपनी दृश्य पहचान भी हर फ्रेम में महसूस हो।

मैं DIAL 1975 के प्रोडक्शन डिज़ाइन को अपने अब तक के सबसे महत्वपूर्ण और बेहतरीन कामों में से एक मानती हूँ। दर्शकों और समीक्षकों द्वारा फिल्म के विज़ुअल ट्रीटमेंट, माहौल और मेरे काम को जिस तरह सराहा जा रहा है, वह मेरे लिए बेहद गर्व और संतोष की बात है। एक Production Designer के लिए इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती है कि उसके द्वारा रचा गया संसार कहानी का सिर्फ बैकड्रॉप न रहकर, खुद कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाए।

इस पूरे सफर का एक और खूबसूरत हिस्सा रहा कीर्ति कुल्हारी और के. के. मेनन जैसे शानदार कलाकारों के साथ काम करना। कीर्ति के साथ काम करना वाकई शानदार अनुभव रहा—उनकी संवेदनशीलता, समर्पण और अपने किरदार के प्रति ईमानदारी बहुत प्रेरणादायक है। और के. के. मेनन सर के साथ काम करना मेरे लिए विशेष रूप से गर्व की बात थी। मैं हमेशा से उनकी बहुत बड़ी प्रशंसक रही हूँ, इसलिए उनके साथ एक ही फिल्म का हिस्सा होना और अपने काम के माध्यम से उनके साथ उस दुनिया को रचना मेरे लिए बेहद खास अनुभव रहा।
DIAL 1975 मेरे लिए रिसर्च, विज़न, मेहनत और पूरी टीम के समर्पण का परिणाम है। इस फिल्म का हर फ्रेम मेरे लिए उस विश्वास का हिस्सा है कि अच्छा Production Design केवल सुंदर दृश्य बनाने के बारे में नहीं होता—बल्कि ऐसा संसार रचने के बारे में होता है, जिसमें दर्शक कहानी को देखे नहीं, बल्कि उसे महसूस करे।












