National ( नितिन ): भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर समाज और कानून की समझ लगातार विकसित हो रही है। हालांकि लिव-इन कपल के बच्चों के अधिकारों जैसे जन्म प्रमाण पत्र में पिता का नाम, सरनेम (उपनाम) और विरासत को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। हाल ही में कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले के जरिए इस विषय पर कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए बच्चे के उपनाम और जैविक पिता की पहचान को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि मां बच्चे का पालन-पोषण कर रही है और उसकी प्राकृतिक अभिभावक है तो वह बच्चे के सरनेम में अपने परिवार का नाम जोड़ सकती है।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि मां का सरनेम जुड़ने से जन्म प्रमाण पत्र में दर्ज जैविक पिता (Biological Father) का नाम नहीं हटाया जाएगा। जरूरत पड़ने पर सरकारी रिकॉर्ड में पिता की पहचान और कानूनी स्थिति यथावत बनी रहेगी। भारतीय कानून के तहत केवल माता-पिता के शादीशुदा न होने के आधार पर बच्चे को उसके मूलभूत अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
लिव-इन में जन्मे बच्चे को कानून के तहत पूरी कानूनी पहचान, भरण-पोषण और देखभाल पाने का अधिकार है। ऐसे बच्चों को परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर माता-पिता की संपत्ति व विरासत में कानूनी हक मिलता है। अदालतों ने बार-बार यह दोहराया है कि किसी भी विवाद में बच्चे का सर्वोत्तम हित सबसे पहली प्राथमिकता होता है।
जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 क्या कहता है?
‘रजिस्ट्रेशन ऑफ बर्थ्स एंड डेथ्स एक्ट, 1969’ के तहत संबंधित रजिस्ट्रार को उचित दस्तावेज और वैध कारण प्रस्तुत किए जाने पर रिकॉर्ड में संशोधन करने का अधिकार प्राप्त है। यदि सही कारण मौजूद हों तो जन्म प्रमाण पत्र में सरनेम से जुड़े बदलाव नियमानुसार किए जा सकते हैं।










