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पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश सिर्फ 7 महीने के लिए बने एमएलसी, उपेंद्र कुशवाहा के मंत्री पुत्र की कुर्सी पर फिर होगी संकट

On: August 11, 2026 5:23 AM
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बिहार (अफजल इमाम ’’मुन्ना’’)। राष्ट्रीय लोक मोर्चा यानी रालोमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष व राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने फिलहाल अपने मंत्री पुत्र दीपक प्रकाश की कुर्सी बचाकर राहत की सांस ली है। लेकिन, 7 महिने बाद फिर संकट होगी। क्योंकि, बिहार के राज्यपाल अवकाश प्राप्त लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने दीपक प्रकाश को बिहार विधान परिषद का मनोनीत सदस्य बना दिया है। उपेंद्र पुत्र दीपक प्रकाश का कार्यकाल 16 मार्च 2027 तक ही रहेगा। उन्हें अभी सिर्फ 7 महीने की राहत मिली है। अगर इसके बाद भी दीपक प्रकाश को मंत्री बने रहना है तो रालोमो सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा को फिर भाजपा से एक और एमएलसी सीट की जरूरत पड़ेगी। वर्तमान में भाजपा ने एक सीट की कुर्बानी दे दी है। भाजपा के मनोनीत विधान पार्षद देवेश कुमार ने त्यागपत्र दिया है। देवेश कुमार की जगह पर ही उपेंद्र पुत्र दीपक प्रकाश एमएलसी बने हैं। पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश ने हाल ही में बिहार विधान परिषद के सदस्य के रूप में शपथ ली है। राजधानी पटना स्थित बिहार विधान परिषद में सभापति अवधेश नारायण सिंह ने उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई है। एमएलसी की शपथ लेने के बाद घर पहुंचे दीपक प्रकाश का सोशल वर्कर पत्नी साक्षी मिश्रा कुशवाहा ने आरती उतार कर स्वागत किया। फिलहाल रालोमो सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा ने बड़ी परेशानी टाल दी है। लेकिन, आने वाले 7 महीने उनके लिए आसान नहीं होंगे। माना जा रहा है कि इस दौरान भाजपा, रालोमो के अपने दल में विलय का दबाव बढ़ा सकती है। अब उपेंद्र कुशवाहा क्या फैसला लेते हैं? उसी पर उनकी और उनके परिवार की आगे की राजनीति काफी हद तक निर्भर करेगी।

राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा की रालोमो में कुल 4 विधायक हैं। इनमें उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा भी शामिल हैं। बाकी 3 विधायक आलोक सिंह, माधव आनंद एवं रामेश्वर महतो पूर्व में भी अलग होने की स्थिति में पहुंच गए थे। उस वक्त बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नें 10वीं बार मुख्यमत्री की शपथग्रहण किए थे। बीते वर्ष नवंबर महीने में राजधानी पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित इस भव्य शपथग्रहण समारोह में ही नीतीश मंत्रिमंडल में पहली बार शामिल किए गए उपेंद्र पुत्र दीपक प्रकाश को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। इस पल के गवाह परिवारवाद के घोर विरोधी रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई दिग्गज नेता बने थे। 36 वर्षीय दीपक कुशवाहा को पंचायती राज मंत्री बनाए जाने के बाद दल में नाराजगी बढ़ गई थी। बाद में उपेंद्र कुशवाहा ने नाराज नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारी देकर मामला संभाल लिया था। उस पूरे घटनाक्रम ने उपेंद्र कुशवाहा को यह संकेत दे दिया था कि उनकी रालोमो तब तक सुरक्षित है, जब तक भाजपा उसे तोड़ने की कोशिश नहीं करती। इसलिए मौजूदा हालात में भी उन्हें अपने राजनीतिक फैसले बेहद सोच-समझकर लेने होंगे।

दीपक प्रकाश बिना किसी सदन के सदस्य बने दोबारा इस वर्ष 7 मई को सम्राट सरकार में भी पंचायती राज मंत्री ही बनाए गए थे। इसी को लेकर मामला राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर हैरानी जताई और बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली नई सरकार से जवाब मांगा। इसके बाद यह मामला उपेंद्र कुशवाहा के पक्ष में जाता दिखा। इस वर्ष दो महीने पूर्व जून में बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए चुनाव हुए थे। लेकिन, उस वक्त भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा के मंत्री पुत्र दीपक प्रकाश को प्रत्याशी नहीं बनाया था। चर्चा है कि रालोमो के भाजपा में विलय से इनकार करने की वजह से उनका नाम उस सूची में शामिल नहीं किया गया। इससे दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बने रहना कठिन होता जा रहा था।

सुप्रीम कोर्ट में जुलाई के आखिरी सप्ताह में सुनवाई से पूर्व भाजपा ने अपने एक मनोनीत एमएलसी देवेश कुमार से इस्तीफा दिलवाया। उसी खाली हुई सीट पर दीपक प्रकाश को बिहार विधान परिषद भेजा गया। इससे सरकार अब सुप्रीम कोर्ट में यह कह सकेगी कि दीपक प्रकाश अब सदन के सदस्य हैं। दीपक प्रकाश के एमएलसी बनने से मामला पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा रहा। जब याचिका दाखिल हुई थी, उस वक्त वह विधायक या एमएलसी बने बिना ही 6 महीने से ज्यादा वक्त तक पंचायती राज मंत्री रह चुके थे। इसलिए सुप्रीम कोर्ट उसी आधार पर मामले की सुनवाई जारी रखता है या नहीं, यह आगे साफ होगा। ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के एक मंत्री की नियुक्ति को बाद में असंवैधानिक और अवैध बताया था। जबकि, तब तक वह सरकार भी समाप्त हो चुकी थी। अगर दीपक प्रकाश के मामले में भी ऐसा फैसला आता है तो इससे उन्हें और भाजपा दोनों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।

अगर सुप्रीम कोर्ट का मामला चलता रहा तो रालोमो सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा पर राजनीतिक दबाव भी बना रहेगा। मार्च 2027 से पूर्व भाजपा फिर रालोमो के विलय का मुद्दा उठा सकती है। अगर विलय नहीं होता तो दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर संकट फिर खड़ा हो सकता है। दूसरी ओर, अगर उपेंद्र कुशवाहा पूर्व की तरह केंद्रीय नेतृत्व से राहत दिलाने में सफल रहे तो राजनीतिक तस्वीर बदल भी सकती है। अब देखना है कि आगे क्या नया राजनैतिक गुल खिलता है? यह तो वक्त आने पर ही पता चल सकता है।

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