Shaheed Udham Singh’s Martyrdom Day 2026: 21 वर्षों का महा-संकल्प,जब शहीद उधम सिंह की रिवाल्वर ने लंदन में लिखा जलियांवाला बाग के न्याय का इतिहास

On: July 31, 2026 1:03 AM
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Shaheed Udham Singh’s Martyrdom Day 2026: 13 मार्च, 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में पंजाब के तत्कालीन लैफ्टिनैंट गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर की गोली मारकर हत्या करने वाले महान क्रांतिकारी थे शहीद उधम सिंह। यह कोई व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं, बल्कि 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए भीषण नरसंहार का बदला था।

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उधम सिंह ने 21 वर्षों तक इस संकल्प को अपने हृदय में जीवित रखा और अंतत: उसे पूरा कर दुनिया को भारतीयों के आत्मसम्मान और साहस का संदेश दिया।

उनका जन्म 26 दिसम्बर, 1899 को पंजाब के सुनाम में एक साधारण परिवार में हुआ। उनका बचपन का नाम शेर सिंह था। कम उम्र में माता-पिता का निधन हो जाने के बाद वह और उनके बड़े भाई साधु सिंह अमृतसर के सैंट्रल खालसा अनाथालय में पले-बढ़े।

वहीं उनका नाम शेर सिंह से उधम सिंह रखा गया। भाई की मृत्यु के बाद वह अकेले रह गए, लेकिन देशभक्ति की भावना उनके भीतर लगातार प्रबल होती गई।

13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग में हजारों निहत्थे भारतीय स्वतंत्रता और अपने अधिकारों की आवाज बुलंद करने के लिए एकत्र हुए थे।

ब्रिटिश शासन के आदेश पर जनरल डायर की सेना ने सभा पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं, जबकि इस दमनकारी नीति के पीछे तत्कालीन लैफ्टिनैंट गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर का भी समर्थन था।

इस अमानवीय नरसंहार में सैकड़ों लोग शहीद हुए और हजारों घायल हुए। उस समय 19 वर्षीय उधम सिंह घायलों की सहायता के लिए वहां पहुंचे। खून से लथपथ वह दृश्य देखकर उन्होंने शपथ ली कि इस अत्याचार के दोषियों को एक दिन अवश्य दंड देंगे।

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इसके बाद उधम सिंह क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए। वह विदेश भी गए और कई वर्षों तक गुप्त रूप से अपने लक्ष्य की तैयारी करते रहे। भारत लौटने पर उन्हें हथियार रखने के आरोप में जेल भी जाना पड़ा। रिहाई के बाद वह फिर अपने मिशन में जुट गए और 1933 में लंदन पहुंचकर उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।

13 मार्च, 1940 को कैक्सटन हॉल में आयोजित एक सभा में माइकल ओ’ड्वायर के पहुंचने की सूचना मिलते ही उधम सिंह अपनी रिवॉल्वर एक मोटी पुस्तक में छिपाकर वहां पहुंचे। सभा समाप्त होते ही उन्होंने ओ’ड्वायर पर गोलियां चला दीं, जिससे उसकी मौके पर ही मृत्यु हो गई।

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अदालत में उन्होंने निर्भीकता से कहा कि उन्हें अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं है, क्योंकि उन्होंने जलियांवाला बाग के शहीदों का न्याय किया है।

अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। 31 जुलाई, 1940 को लंदन की पेंटनविल जेल में वह हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए। उनका बलिदान स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अदम्य साहस, देशभक्ति और अन्याय के विरुद्ध अडिग संघर्ष का अमर प्रतीक है। आज उनका जीवन प्रत्येक भारतीय को राष्ट्रप्रेम, साहस और बलिदान की प्रेरणा देता है। 

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