बकरीद (ईद-उल-अजहा) पैगंबर हजरत इब्राहिम द्वारा अल्लाह के प्रति दिखाए गए सर्वोच्च त्याग, समर्पण और अटूट विश्वास की याद में मनाई जाती है। यह इस्लाम धर्म का सबसे प्रमुख त्योहार है, जिसे ‘बलिदान के पर्व’ के रूप में भी जाना जाता है और यह इस्लामी कैलेंडर के आखिरी महीने ‘जिलहिज्जा’ की 10वीं तारीख को मनाया जाता है।
बकरीद के पीछे की मुख्य कहानी और इसका महत्व:
इस्लामिक मान्यता के अनुसार, एक बार अल्लाह ने पैगंबर हजरत इब्राहिम (अब्राहम) की निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए सपने में उन्हें अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने का हुक्म दिया।
हजरत इब्राहिम को 80 वर्ष की आयु में पुत्र (हजरत इस्माइल) की प्राप्ति हुई थी, इसलिए उन्हें अपना बेटा सबसे प्यारा था। अल्लाह के हुक्म का पालन करते हुए, इब्राहिम अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए और उनके बेटे ने भी खुशी-खुशी अपनी गर्दन आगे कर दी, जैसे ही हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए छुरी चलाई, अल्लाह के हुक्म से एक चमत्कार हुआ और बेटे की जगह एक दुम्बा (भेड़) आ गया और उनके बेटे की जान बच गई। अल्लाह उनकी इस निष्ठा से बेहद प्रसन्न हुए।
इसी घटना की याद में और अल्लाह की राह में अपना सब कुछ न्योछावर करने की भावना के प्रतीक के रूप में बकरीद का त्योहार मनाया जाता है।
त्योहार का मुख्य उद्देश्य और जश्न:
इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग ईदगाह या मस्जिदों में विशेष नमाज अदा करते हैं और देश में अमन-चैन की दुआ मांगते हैं। नमाज के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार बकरे, भेड़ या अन्य जायज जानवर की कुर्बानी दी जाती है। इस कुर्बानी के मांस को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है: एक हिस्सा अपने परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों/दोस्तों के लिए, और तीसरा हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों में दान कर दिया जाता है।






