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13 डॉक्टर की टीम, 8 घण्टे 30 मिनिट चला ऑपरेशन. मजदूर के शरीर से निकाली गई 6 सरिया मिला जीवन दान…

By ENN
On: July 16, 2026 11:39 AM
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रिपोर्ट – आमिर हुसैन, लखनऊ

केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर में अद्भुत जीवनरक्षक सर्जरी: युवक के शरीर को आर-पार भेदने वाली चार लोहे की सरियों को सफलतापूर्वक निकाला गया

“एक ओर विश्वविद्यालय अपने 23वें दीक्षांत समारोह में चिकित्सकों का सम्मान कर रहा था, वहीं दूसरी ओर ऑपरेशन थिएटर में डॉक्टरों की एक टीम एक युवक की जान बचाने में जुटी हुई थी।”

लखनऊ : किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) ट्रॉमा सेंटर के चिकित्सकों ने एक बार फिर अपनी उत्कृष्ट आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं और समर्पण का परिचय देते हुए 3 वर्षीय युवक की अत्यंत दुर्लभ एवं जटिल जीवनरक्षक शल्यक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न की।

यह मामला इसलिए अत्यंत असाधारण था क्योंकि चार लोहे की सरियां मरीज के बाएं नितंब (Left Buttock) से प्रवेश कर पेट और छाती को भेदते हुए शरीर के विभिन्न हिस्सों से बाहर निकली थीं। इनमें से तीन सरियां दाहिने कंधे एवं गर्दन के समीप तक पहुंच गई थीं, जबकि एक सरिया रीढ़ (Spine) के पास पीठ की ओर निकली थी। इन सरियों से फेफड़ा, डायफ्राम, आमाशय (स्टमक), छोटी आंत, प्लीहा (स्प्लीन) तथा मूत्राशय (यूरिनरी ब्लैडर) सहित कई महत्वपूर्ण अंग गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गए थे।

उमेश (23 वर्ष) निवासी ग्राम नरैया, थाना राजेपुर, तहसील अमृतपुर, जनपद फर्रुखाबाद, पेशे से मजदूर हैं। 13 जुलाई 2026 को प्रातः लगभग 4:30 बजे लखनऊ के बादशाह नगर स्थित निर्माणाधीन इमारत पर कार्य करते समय ऊंचाई से गिरने के कारण वे कई लोहे की सरियों पर जा गिरे। सरियां उनके शरीर में धंस गईं और वे उन्हीं में फंस गए। स्थानीय लोगों ने सरियों को काटकर उन्हें उसी अवस्था में तत्काल केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर पहुंचाया, जहां वे सुबह लगभग 3:30 बजे भर्ती किए गए।

ट्रॉमा सेंटर पहुंचने पर मरीज की स्थिति अत्यंत गंभीर थी। उनका रक्तचाप अस्थिर था तथा मूत्र में रक्त आ रहा था। शरीर में लोहे की सरियां उसी अवस्था में मौजूद थीं। प्रो. डॉ. समीर मिश्रा के निर्देशन में डॉ. नरेंद्र कुमार ने एडवांस्ड ट्रॉमा लाइफ सपोर्ट (ATLS) प्रोटोकॉल के अनुसार तत्काल पुनर्जीवन (Resuscitation) प्रारंभ कराया। इमरजेंसी में वरिष्ठ रेजिडेंट डॉ. चरणवीर एवं उनकी टीम ने मरीज को स्थिर करते हुए आवश्यक जांचें कराईं। सीटी स्कैन में पाया गया कि चारों सरियां मूत्राशय, छोटी आंत, आमाशय, प्लीहा, पेट की प्रमुख रक्त वाहिकाओं (Great Vessels), डायफ्राम तथा हृदय के अत्यंत समीप से गुजरते हुए बाएं फेफड़े को भेद चुकी थीं, जिससे न्यूमोथोरैक्स (Pneumothorax) हो गया था। तत्काल दोनों ओर इंटरकॉस्टल ड्रेन (ICD) डाले गए, जिनसे रक्त एवं वायु बाहर निकाली गई और फेफड़ों का फैलाव बेहतर हुआ। इसके बाद मरीज को तुरंत ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया।

शरीर में धंसी सरियों को बिना उचित शल्य तैयारी के निकालना अत्यंत घातक सिद्ध हो सकता था क्योंकि इससे अनियंत्रित एवं जानलेवा रक्तस्राव हो सकता था। इसलिए सर्जिकल टीम ने अत्यंत सावधानीपूर्वक ऑपरेशन की विस्तृत योजना बनाई।

मरीज की लैपरोटॉमी (Laparotomy) तथा बाईं ओर एंटेरोलेटरल थोरेकोटॉमी (Left Anterolateral Thoracotomy) एक साथ की गई। ऑपरेशन के दौरान छाती एवं पेट में जमा रक्त के थक्कों को निकाला गया तथा सबसे पहले प्रमुख रक्त वाहिकाओं (Vascular Control) को सुरक्षित किया गया। इसके पश्चात चारों लोहे की सरियों को प्रत्यक्ष दृष्टि (Direct Vision) में अत्यंत सावधानी से निकाला गया। यह शल्यक्रिया अत्यंत चुनौतीपूर्ण थी क्योंकि इसमें मूत्राशय, आंत, आमाशय, प्लीहा, पेट की बड़ी रक्त वाहिकाएं, डायफ्राम एवं फेफड़े सहित अनेक महत्वपूर्ण अंग क्षतिग्रस्त थे। सबसे कठिन कार्य चारों सरियों को इस प्रकार निकालना था कि हृदय, फेफड़े, प्लीहा और प्रमुख रक्त वाहिकाओं को अतिरिक्त क्षति न पहुंचे तथा अत्यधिक रक्तस्राव को रोका जा सके।

ऑपरेशन के दौरान प्रो. डॉ. समीर मिश्रा एवं डॉ. नरेंद्र कुमार ने एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. विपिन के नेतृत्व वाली टीम के साथ उत्कृष्ट समन्वय स्थापित किया। चौथी सरिया, जो हृदय एवं बाएं फेफड़े के हिलम (Hilum) के अत्यंत समीप थी, निकालते समय मरीज का रक्तचाप अचानक अत्यधिक गिर गया, जिसे ट्रॉमा एवं एनेस्थीसिया टीम ने तत्काल नियंत्रित कर मरीज की जान बचाई। सरियां निकालने के बाद क्षतिग्रस्त अंगों की मरम्मत की गई। मूत्राशय में तीन स्थानों पर हुए छिद्रों की सफल मरम्मत की गई। छोटी आंत में अनेक छिद्र पाए गए, जिनका उपचार आंतों को जोड़कर (Anastomosis) तथा आवश्यक स्थान पर स्टोमा बनाकर किया गया। आमाशय के आगे एवं पीछे दोनों ओर हुए छिद्रों की मरम्मत की गई। प्लीहा की चोट का उपचार पैकिंग द्वारा किया गया तथा बाईं ओर फटे डायफ्राम की भी सफल मरम्मत की गई।

ऑपरेशन के दौरान हुए रक्तस्राव की भरपाई हेतु मरीज को यूनिट पैक्ड रेड ब्लड सेल्स (PRBC) तथा यूनिट फ्रेश फ्रोजन प्लाज्मा (FFP) चढ़ाया गया। सफल शल्यक्रिया के बाद मरीज को स्थिर अवस्था में आईसीयू में स्थानांतरित किया गया।

वर्तमान में मरीज की स्थिति स्थिर है। शल्यक्रिया के बाद उनका रक्तचाप, नाड़ी तथा ऑक्सीजन स्तर सामान्य हो चुका है तथा वे आईसीयू में क्रिटिकल केयर विशेषज्ञों की निगरानी में निरंतर स्वस्थ हो रहे हैं।

मरीज आर्थिक रूप से कमजोर एवं दैनिक मजदूरी करने वाला है। इसलिए केजीएमयू एवं चंदरानी जैन चैरिटेबल ट्रस्ट, चौक के संयुक्त प्रयासों से उसे समय पर आर्थिक एवं मानवीय सहायता उपलब्ध कराई गई, जिससे उपचार बिना किसी बाधा के जारी रह सका।

केजीएमयू की माननीय कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने इस सफल एवं जटिल शल्यक्रिया के लिए पूरी सर्जिकल टीम को बधाई दी तथा मरीज के शीघ्र पूर्ण स्वस्थ होने की कामना की। उन्होंने कहा कि ट्रॉमा सर्जरी विभाग एवं ट्रॉमा सेंटर ने एक बार फिर त्वरित एवं उच्च गुणवत्ता वाली आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं प्रदान कर प्रदेश एवं देश में अपनी अग्रणी भूमिका सिद्ध की है।

ऑपरेशन करने वाली डॉक्टर टीम —-

डॉ. पार्थ- जूनियर रेजिडेंट-1

प्रो. डॉ. समीर मिश्रा वरिष्ठ परामर्शदाता एवं प्रभारी

डॉ. नरेंद्र कुमार – परामर्शदाता एवं प्रभारी

डॉ. यादवेन्द्र धीर परामर्शदाता

डॉ. रैम्बिट वरिष्ठ रेजिडेंट

डॉ. चरणवीर- वरिष्ठ रेजिडेंट

डॉ. महेश – जूनियर रेजिडेंट-3

डॉ. प्रज्ज्वल – जूनियर रेजिडेंट-3

डॉ. धैर्य जूनियर रेजिडेंट-

डॉ. अंकित – जूनियर रेजिडेंट-2

डॉ. अखंड – जूनियर रेजिडेंट-

डॉ. मोहतास्सिन – जूनियर रेजिडेंट-1

डॉ. सागर – जूनियर रेजिडेंट-1

सर्जरी का समय: सुबह 7:00 बजे से दोपहर 3:30 बजे तक (लगभग 8 घंटे 30 मिनट)

ट्रॉमा सर्जनों ने इस अवसर पर कहा कि यदि किसी मरीज के सीने या शरीर में कोई नुकीली वस्तु या हथियार धंसा हो, तो उसे कभी भी ऑपरेशन थिएटर के बाहर नहीं निकालना चाहिए। ऐसी वस्तुएं कई बार रक्तस्राव को अस्थायी रूप से रोकने (Tamponade Effect) का कार्य करती हैं। इसलिए पहले मरीज को स्थिर करना, आवश्यक जांच एवं इमेजिंग करना तथा पर्याप्त शल्य तैयारी एवं रक्त वाहिकाओं के नियंत्रण (Vascular Control) के बाद ही ऑपरेशन थिएटर में उस वस्तु को निकालना चाहिए। यही तरीका मरीज की सुरक्षा सुनिश्चित करता है और अनेक मामलों में जीवनरक्षक सिद्ध होता है।

यह सफल उपचार एक बार फिर “Sincerity, Service and Sacrifice” की भावना को साकार करता है तथा ट्रॉमा सर्जरी, रेडियोलॉजी, ब्लड बैंक, एनेस्थीसिया एवं क्रिटिकल केयर विभागों के उत्कृष्ट समन्वय और केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर की जटिल पेनिट्रेटिंग थोराकोएब्डॉमिनल चोटों के उपचार में विशेषज्ञता को दर्शाता है।

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