बिहार (अफजल इमाम ’’मुन्ना’’)। बिहार में राजधानी पटना की चर्चित बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में देश के चर्चित चुनावी रणनीतिकार रह चुके जन सुराज पार्टी यानी जेएसपी के सूत्रधार व पहली बार चुनावी दंगल में कूदे प्रशांत किशोर यानी पीके ने शानदार जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया है। बांकीपुर उपचुनाव ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। क्योंकि, प्रशांत किशोर ने सत्ताधारी दल भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा को 19,324 वोट से पराजित किया है। प्रशांत किशोर को कुल 64,151 वोट मिले हैं। जबकि, दूसरे स्थान पर रहे एनडीए समर्थित भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा को 44,827 वोट मिले। वहीं, महागठबंधन समर्थित राजद प्रत्याशी रेखा गुप्ता 14,273 वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर रहीं हैं। उनकी जमानत तक जब्त हो गई है। प्रशांत किशोर को हर जाति, धर्म व हर वर्ग का वोट मिला है। पहले राउंड में उन्हे 862 वोट की लीड मिली। इसके बाद वे लगातार बढ़ बनाए रखे रहे। राउंडवार मतगणना में 28वें राउंड में जेएसपी और भाजपा के बीच सबसे ज्यादा अंतर रहा, जो अंतिम 32वें राउंड तक जारी रहा। यह सीट भाजपा का गढ़ रहा है। क्योंकि, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व राज्यसभा सांसद नितिन नवीन एवं उनके पिताश्री दिवंगत भाजपा नेता नवीन किशोर सिन्हा बांकीपुर से लगातार 9 बार जीते हैं। बांकीपुर सीट पर 31 वर्षों से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। ऐसे में प्रशांत किशोर की जीत को जेएसपी के लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। इस नतीजे ने बांकीपुर के पुराने राजनीतिक समीकरण को भी बदल दिया है। पेशे से चिकित्सक पीके की पत्नी डॉ.जाह्नवी दास ने इस जीत का श्रेय पहले सोमवारी के दिन महादेव को दिया और बांकीपुर की जनता के प्रति आभार व्यक्त की हैं।

देश के चर्चित चुनावी रणनीतिकार से पहली बार विधायक बने प्रशांत किशोर की जीत के साथ जेएसपी ने बिहार की सियासत में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। भाजपा के पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्र में जीत ने दल के सामने भी नए राजनीतिक सवाल खड़े किए हैं। वहीं, देश के कद्दावर समाजवादी नेता व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की नेतृत्व वाली राजद इस बार तीसरे स्थान पर रही है। बांकीपुर के नतीजे ने बिहार की राजनीति में तीसरे विकल्प को लेकर चर्चा तेज कर दी है। प्रशांत किशोर की इस जीत का असर आने वाले चुनावों की रणनीति व राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

भाजपा ने पहले अभिषेक कुमार सिन्हा उर्फ बंटी सिन्हा को एनडीए प्रत्याशी बनाया था। उन्होंने नामांकन भी दाखिल किया और भाजपा व एनडीए के बड़े नेताओं ने उनके साथ चुनाव प्रचार की शुरुआत भी कर दी थी। लेकिन, बाद में उन्होंने पारिवारीक कारणों से चुनाव नहीं लड़ने का फैसला लिया। इसके बाद भाजपा ने नीरज कुमार उर्फ नीरज सिन्हा को प्रत्याशी बनाया। दोनों ही नितिन नवीन के करीबी रहे हैं। चुनाव के बीच प्रत्याशी बदलने से विपक्ष को मुद्दा मिला और कई वोटरों के बीच भ्रम की स्थिति भी बनी। इसका असर चुनाव पर दिखाई दिया। चर्चित चुनावी रणनीतिकार रह चुके जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर के चुनाव मैदान में उतरते ही बांकीपुर का मुकाबला देश व राज्य का सबसे चर्चित चुनाव बन गया। उन्होंने बड़े-बड़े मंचों से ज्यादा घर-घर व कैफे, कोचिंग हब्स, जिम्म और पार्कों में जाकर लोगों से सम्पर्क किया। प्रचार के दौरान स्थानीय समस्याओं, रोजगार, शिक्षा और विकास जैसे मुद्दों पर फोकस रखा। इससे चुनाव का माहौल पूरी तरह बदल गया और मुकाबला भाजपा बनाम जेएसपी बन गया। प्रशांत किशोर ने युवाओं के साथ हर जाति के वोटरों को जोड़ा। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने से नाराज वोटरों का समर्थन मिला। मुस्लिम-यादव वोटरों को भी अपने पक्ष में करने में सफलता पाई। नतीजा आप सभी के सामने है।
भाजपा को बांकीपुर सीट पर हमेशा मजबूत संगठन का फायदा मिलता रहा है। लेकिन, इस बार जेएसपी ने बूथ स्तर तक पूरी तैयारी की। जेएसपी की टीम लगातार लोगों से संपर्क करती रही और समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने पर खास ध्यान दिया। दूसरी ओर कम मतदान ने भाजपा की रणनीति को नुकसान पहुंचाया। माना गया कि एनडीए समर्थित भाजपा अपने सभी समर्थकों को मतदान केंद्र तक नहीं ला सकी। इस उपचुनाव में पहली बार वोट डालने वाले युवा वोटरों की भूमिका भी अहम मानी गई। चुनाव प्रचार के दौरान सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर युवाओं के बीच जेएसपी की सक्रियता ज्यादा दिखाई दी। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं के एक वर्ग का समर्थन प्रशांत किशोर की ओर गया, जिससे उन्हें फायदा हुआ है। बीते वर्ष नवंबर महीने में संपन्न हुए 18वीं बिहार विधानसभा आम चुनाव में महागठबंधन समर्थित राजद की रेखा गुप्ता 46,363 वोट लाकर इस सीट पर दूसरे स्थान पर रही थीं। उन्हें महज 14,273 वोट मिले, जिसके कारण उनकी जमानत भी जब्त हो गई। बांकीपुर उपचुनाव में कुल 1,30,313 वोट पड़े। विधानसभा चुनाव में किसी भी प्रत्याशी की जमानत बचाने के लिए कुल वैध मतों का कम से कम एक-छठा यानी करीब 16.67 प्रतिशत वोट हासिल करना जरूरी होता है। लेकिन, बांकीपुर में यह आंकड़ा करीब 21,719 वोट बैठता है। रेखा गुप्ता को इससे काफी कम वोट मिले। चुनाव के दौरान राजद का प्रचार अपेक्षा के मुताबिक मजबूत नहीं दिखा। कई इलाकों में राजद को अपने पारंपरिक वोट भी पहले की तरह नहीं मिले। इसका फायदा जेएसपी को मिला और मुकाबला भाजपा और जेएसपी के बीच सिमट कर रह गया।

वैसे, बांकीपुर सीट बचाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने लगातार चुनाव प्रचार किया। 40 के 40 स्टार प्रचारकों को राजधानी पटना की सड़कों व गली-मुहल्लों में उतार दिया। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार से एमएलसी बने पवन सिंह व सांसद मनोज तिवारी सहित कई बड़े नेताओं ने भी यहां जनसभाएं कीं। सांसद, विधायक और संगठन के पदाधिकारियों को भी चुनाव प्रचार में लगाया गया। इसके बावजूद जेएसपी ने लगातार बढ़त बनाए रखी और आखिर में जीत दर्ज कर ली। बांकीपुर का नतीजा सिर्फ एक सीट की जीत-हार नहीं माना जा रहा। इस चुनाव ने यह दिखाया कि बिहार की राजनीति में अब नए राजनीतिक विकल्प भी चुनौती देने की स्थिति में हैं। भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का मौका है। जबकि, जेएसपी के लिए यह बड़ी राजनीतिक सफलता मानी जा रही है। वहीं, राजद को भी अपने संगठन और वोट बैंक को लेकर नई रणनीति बनानी होगी।
देश भर में अब तक दूसरे नेताओं के लिए चुनावी रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर ने पहली बार खुद चुनाव लड़ा। उनकी दल जेएसपी ने 2025 के अक्टुबर-नवंबर महीने में संपन्न हुए 18वीं बिहार विधानसभा आम चुनाव में हिस्सा लिया। लेकिन, अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद बांकीपुर उपचुनाव में उन्होंने पहली बार प्रत्याशी के रूप में खुद चुनाव लड़ा और बड़ी जीत दर्ज कर अपने राजनीतिक करियर का नया अध्याय शुरू किया। प्रशांत किशोर लम्बे वक्त तक पर्दे के पीछे रहकर चुनावी रणनीति तैयार करते रहे हैं। लेकिन, बांकीपुर उपचुनाव की जीत ने उन्हें पर्दे के पीछे के रणनीतिकार से जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में स्थापित कर दिया है। भाजपा के मजबूत माने जाने वाले गढ़ में मिली यह सफलता न केवल उनके राजनीतिक भविष्य को नई दिशा देती है। बल्कि, बिहार की राजनीति में एक नए विकल्प के उभरने का संकेत भी मानी जा रही है। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि रणनीतिकार के रूप में सफल रहे प्रशांत किशोर जनप्रतिनिधि की भूमिका में कितना प्रभाव छोड़ पाते हैं।










