हरिमोहन श्रीवास की कलम से भारतीय लोकतंत्र के सात दशकों के सफर में आज जब हम एक आधुनिक और प्रगतिशील राष्ट्र होने का दावा करते हैं, तब देश की राजनीतिक और सामाजिक जमीन से आने वाली कुछ तस्वीरें हमें ठहरकर सोचने पर मजबूर करती हैं। देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की उत्तराखंड के हल्द्वानी में हुई रैली के बाद आयोजन स्थल का कुछ संगठनों द्वारा ‘कथित शुद्धिकरण’ किया जाना केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि यह हमारी सामाजिक चेतना की गहरी बीमारी का जीवंत प्रमाण है। जब देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे या विपक्ष का नेतृत्व कर रहे दलित-पिछड़े समाज के नेताओं के साथ इस तरह का व्यवहार होता है—जैसा कि अतीत में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और अन्य नेताओं के संदर्भ में भी देखा गया—तो सहज ही यह सवाल उठता है कि देश के सुदूर अंचलों में रहने वाले आम दलित नागरिक को रोज़मर्रा के जीवन में किस कदर सामाजिक प्रताड़ना और छुआछूत का दंश झेलना पड़ता होगा।
एक ओर जहां समाज में इस तरह की संकीर्ण और सामंती मानसिकता (जिसे आलोचक मनुवादी सोच का विस्तार मानते हैं) आज भी जीवित है, वहीं दूसरी ओर देश के राजनीतिक पटल पर दलित समाज को रिझाने के लिए सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल की एक नई होड़ मची है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा देश भर में बड़े पैमाने पर ‘सामाजिक समरसता अभियान’ चलाया जा रहा है। इसके तहत राष्ट्र संत गुरु रविदास जी के विचारों, उनके जीवन दर्शन को रेखांकित करते हुए भव्य मंदिरों का निर्माण और यात्राएं निकाली जा रही हैं।
किंतु, राजनीति के इस सांस्कृतिक नैरेटिव के पीछे की मंशा और कथनी-करनी के अंतर को भी समझना बेहद जरूरी है। दलित चेतना और आलोचकों का एक बड़ा वर्ग इस पूरे अभियान को केवल एक ‘चुनावी छलावा’ और ‘वोट बैंक’ की राजनीति के रूप में देखता है। इस अविश्वास के पीछे गहरे ऐतिहासिक कारण हैं।
साल 2019 में दिल्ली के तुगलकाबाद में स्थित सदियों पुराने ऐतिहासिक संत रविदास मंदिर को प्रशासनिक बुलडोज़र से ढहा दिया गया था, जिसने देश भर के दलित समाज और गुरु रविदास के अनुयायियों की आस्था को गहरी ठेस पहुंचाई थी। आज वही वर्ग यह सवाल पूछ रहा है कि जो वैचारिक तंत्र कल तक आस्था के उस प्राचीन केंद्र की रक्षा नहीं कर सका, वह आज आगामी चुनावों को देखते हुए अचानक संत रविदास जी का इतना बड़ा पैरोकार कैसे बन गया? क्या यह आयोजन केवल एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में बनाए रखने की एक रणनीति मात्र है?
संत रविदास जी ने जिस ‘बेगमपुरा’ यानी एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जहाँ कोई दुःख, ऊंच-नीच या जातिगत भेदभाव न हो, वह केवल बड़े-बड़े आयोजनों से साकार नहीं हो सकता। इसके लिए ज़मीनी स्तर पर मानसिकता में अमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। एक तरफ सामाजिक समरसता का ढोल पीटना और दूसरी तरफ समाज के भीतर जातिगत श्रेष्ठता के बोध को बनाए रखना, एक ऐसा अंतर्विरोध है जो दलित समाज के साथ सरासर बेइमानी सिद्ध होता है।
यही कारण है कि आज दलित समाज के भीतर अपने संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण को लेकर जागरूकता और चिंता दोनों गहरी हुई हैं। जब समाज में ‘शुद्धिकरण’ और सांकेतिक समरसता के अंतर्विरोध दिखाई देते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि आरक्षण केवल रोज़गार या आर्थिक उन्नति का जरिया नहीं है। आरक्षण बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा दिया गया वह अचूक सुरक्षा कवच है, जो इस समाज को देश के नीति-निर्माण और शासन-प्रशासन के शीर्ष पदों तक पहुंचने का वैधानिक मार्ग और सुरक्षा प्रदान करता है।
संपादकीय दृष्टिकोण से, यह समय प्रतीकों की सतही राजनीति से ऊपर उठने का है। यदि हम वास्तव में संत रविदास जी या बाबासाहेब के सपनों का भारत बनाना चाहते हैं, तो हमें कागजी समरसता से आगे बढ़कर ज़मीन पर हर नागरिक को ‘समान सम्मान’ और सुरक्षा देनी होगी। जब तक हमारी सामाजिक चेतना से जातिगत ऊंच-नीच का पूरी तरह ‘शुद्धिकरण’ नहीं हो जाता, तब तक एक समतामूलक और न्यायपूर्ण राष्ट्र का निर्माण असंभव रहेगा।












