अमृतसर (नितिन): धान की पराली जलाने से उठ रहे धुएं, वाहनों के प्रदूषण और बदलते मौसम ने अब गुरु नगरी अमृतसर के लोगों की सांसों पर संकट खड़ा करना शुरू कर दिया है। दीपावली के त्यौहार में अभी 5 दिन बाकी हैं लेकिन शहर पहले ही स्मॉग की चपेट में आने लगा है। हवा की गुणवत्ता का ए.क्यू.आई. 164 दर्ज किया गया है। सुबह तड़के और शाम के समय धुंध व धुएं जैसी परत शहर के वातावरण में महसूस हो रही है। हवा में मौजूद बारीक जहरीले प्रदूषण कण और विभिन्न गैसें सांस के रास्ते फेफड़ों तक पहुंचकर खासकर दमा, ब्रोंकाइटिस और सी.ओ.पी.डी. के मरीजों की मुश्किलें बढ़ा सकती हैं। चिंता का विषय यह है कि धान की कटाई के दौरान पराली जलाने के 144 मामले सामने आ चुके हैं। इनमें से 27 किसानों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज की गई हैं जबकि 56 किसानों की रैड एंट्री दर्ज की गई हैं। खेतों में पराली को आग लगाने से उठने वाला धुआं हवा में प्रदूषण कणों की मात्रा बढ़ाता है। ये कण हवा के साथ दूर-दूर तक फैलकर शहरी इलाकों तक भी पहुंच सकते हैं।
जानकारी के अनुसार अमृतसर में स्मॉग के दौरान हवा में कई किस्म के प्रदूषण कण और गैसें मौजूद हो सकती हैं। इनमें सबसे चिंताजनक पी.एम. 2.5 और पी.एम. 10 हैं। पी.एम. 2.5 बहुत ही बारीक कण होते हैं, जिनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या इससे कम होता है। यह सांस के रास्ते फेफड़ों की गहरी परतों तक पहुंच सकते हैं और कुछ हालात में खून के संचार से जुड़े प्रभाव भी पैदा कर सकते हैं। दूसरी ओर पी.एम. 10 कण सांस की नलियों में दाखिल होकर खांसी, गले में जलन और सांस की समस्याएं बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा पराली के धुएं, वाहनों के निकास और अन्य प्रदूषण स्रोतों से कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और विभिन्न वाष्पशील कार्बनिक यौगिक भी निकल सकते हैं। नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूरज की रोशनी रासायनिक प्रतिक्रिया कर जमीनी स्तर पर ओजोन (ओ-3) बनाने में योगदान दे सकते हैं। ये सभी प्रदूषक श्वसन प्रणाली को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
छाती रोग विशेषज्ञ और पूर्व जिला टी.बी. अधिकारी डा. नरेश चावला ने बताया कि स्मॉग की स्थिति में जब हवा की गति कम होती है और वातावरण में तापमान की परतों के कारण हवा का ऊपर की तरफ मिलाप रुकता है, तो प्रदूषक जमीनी स्तर के नजदीक जमा रह सकते हैं। इस स्थिति को तापमान उलटाव कहा जाता है। इस कारण धुआं और प्रदूषण आसानी से ऊपर नहीं फैल सकते और लोगों के सांस लेने वाले स्तर पर ही बने रह सकते हैं। इस तरह लोग जब सुबह सैर करते हैं या कामकाज के लिए घरों से बाहर निकलते हैं तो प्रदूषित हवा सांस के जरिए शरीर में दाखिल होती है। खासकर पहले से सांस की बीमारियों से पीड़ित लोगों में इसका असर ज्यादा देखने को मिल सकता है।
दमा के मरीजों की सांस की नलियों में बढ़ सकती है सूजन
डा. रजनीश शर्मा के अनुसार स्मॉग और पी.एम. 2.5 जैसे बारीक प्रदूषण कण दमा के मरीजों के लिए गंभीर समस्या बन सकते हैं। दमा के मरीजों की सांस की नलियां पहले ही संवेदनशील होती हैं। प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से इन नलियों में सूजन और जलन बढ़ सकती है। इस कारण मरीज को सांस में सीटी जैसी आवाज, सीने में जकड़न, लगातार खांसी और सांस लेने में मुश्किल हो सकती है। कई बार मरीजों को रात के समय और सुबह उठने वक्त सांस की तकलीफ ज्यादा महसूस होती है। ऐसे मरीजों को डॉक्टर द्वारा दी गई दवाइयों और इनहेलर का नियमित इस्तेमाल करना चाहिए।
सी.ओ.पी.डी. व ब्रोंकाइटिस के मरीजों के लिए खतरा, फेफड़ों की कार्यक्षमता हो सकती है प्रभावित
सरकारी मैडीकल कॉलेज के डॉ. विशाल वर्मा के अनुसार सी.ओ.पी.डी. और पुरानी ब्रोंकाइटिस से पीड़ित मरीजों की श्वसन प्रणाली पहले से कमजोर होती है। प्रदूषित हवा के संपर्क से इन मरीजों में खांसी, बलगम और सांस फूलने की समस्या बढ़ सकती है। कई बार बीमारी के लक्षण गंभीर होने के कारण अस्पताल में भर्ती होने की नौबत भी आ सकती है। बुजुर्गों, दिल के मरीजों और छोटे बच्चों को भी इस माहौल में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। लगातार खांसी, सांस लेने में तकलीफ, सीने में जकड़न या अचानक सांस फूलने को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए।
दीपावली के पटाखों से और बिगड़ सकती है स्थिति
दीपावली के मौके पर पटाखों से निकलने वाला धुआं, धूल और बारीक कण हवा की गुणवत्ता को और प्रभावित कर सकते हैं। पटाखों से पी.एम. 2.5 और पी.एम. 10 के साथ सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और धातुओं के बारीक कण भी वातावरण में फैल सकते हैं। इससे पहले से बीमार मरीजों की मुश्किलें बढ़ने का खतरा रहता है। सरकारी छाती रोग अस्पताल के सीनियर डॉक्टर संदीप महाजन के अनुसार लोगों को स्मॉग वाले दिनों में सुबह-शाम बाहर सैर करने से बचना चाहिए। बाहर जाते समय जरूरत के अनुसार अच्छी फिटिंग वाला एन-95 मास्क इस्तेमाल किया जा सकता है। घरों में धुआं न होने देना और प्रदूषण के स्रोतों से दूर रहना भी जरूरी है।
पी.एम. 2.5 के बारीक कण फेफड़ों की गहरी परतों तक पहुंच सकते हैं
सरकारी टी.बी. अस्पताल के छाती रोग विशेषज्ञ डा. दलजीत सिंह के अनुसार स्मॉग के दौरान हवा में मौजूद पी.एम. 2.5 जैसे बारीक प्रदूषण कण सांस के रास्ते फेफड़ों की गहरी परतों तक पहुंच सकते हैं। यह कण सांस की नलियों में जलन और सूजन बढ़ा सकते हैं। खासकर दमा, ब्रोंकाइटिस और सी.ओ.पी.डी. के मरीजों को सांस फूलने, खांसी और सीने में जकड़न की समस्या हो सकती है। ऐसे मरीजों को प्रदूषित हवा से बचना और अपना इलाज नियमित जारी रखना चाहिए।







