बिहार (अफजल इमाम ’’मुन्ना’’)। बिहार विधान परिषद यानी एमएलसी चुनाव की 8 सीटों के परिणामों ने बिहार की राजनीति में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। किसी के लिए यह जीत राजनीतिक ताकत का प्रमाण बनी, तो किसी के लिए आत्ममंथन का मौका। एनडीए समर्थित भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा ने 2 सीटों पर जीत दर्ज कर बेहतर प्रदर्शन किया। जबकि, जनता दल (युनाइटेड) यानी जद(यू.) को सिर्फ 1 सीट पर संतोष करना पड़ा है। महागठबंधन में बिखराव के बावजूद राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद ने भी 2 सीट जीतकर बहुत बेहतर प्रदर्शन किया है। वहीं, देश के चर्चित चुनावी रणनीतिकार रह चुके जन सुराज पार्टी यानी जसुपा के संस्थापक व बांकीपुर के विधायक प्रशांत किशोर यानी पीके की दल ने दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जीत हासिल कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। जबकि, 2 सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी बाजी मारी है। इन परिणामों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस चुनाव में कौन पास हुआ और किसे अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता है।
बिहार की 8 एमएलसी सीटों पर हुए चुनाव में सबसे चर्चित सीट पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की रही है। जहां इस सीट पर चौका लगाने वाले मौजूदा एमएलसी नीरज कुमार की जीत को जद(यू.) के लिए अहम माना जा रहा है। दल के अंदर इस सफलता का श्रेय बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके राज्यसभा सांसद व जद(यू.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के एकलौते पुत्र राज्य के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार के नेतृत्व और उनके राजनीतिक प्रभाव को दिया जा रहा है। राजनीति में कदम रखने के कुछ महीनों बाद ही इस चुनाव से उनका नाम जुड़ना उनके लिए पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है। क्योंकि, मोकामा के बाहुबली जद(यू.) विधायक अनंत कुमार सिंह के काफी विरोध के बावजूद जद(यू.) प्रत्याशी नीरज कुमार ने बाजी मार ली है। विधायक अनंत सिंह के जसुपा प्रत्याशी डॉ.अनुज सिंह तीसरे स्थान पर रहे हैं। जद(यू.) ने विधायक अनंत सिंह और उनकी पत्नी पूर्व विधायक नीलम देवी को 6 वर्षों के लिए दल से निष्कासित कर दिया है। साथ ही, नीलम देवी को पटना के 1, मॉल रोड स्थित सरकारी आवास को खाली करने का निर्देश दिया गया है। आदेश के अनुसार, उन्हें इस वर्ष 25 नवंबर तक सरकारी आवास खाली करना होगा। पूर्व विधायक नीलम देवी को इससे पूर्व 20 सूत्री राज्य कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति के सदस्य पद से हटा दिया गया था। जद(यू.) की अनुशंसा पर हुयी इस कार्रवाई के साथ उन्हें मिला राज्य मंत्री का दर्जा भी समाप्त कर दिया गया है। अब अनंत सिंह की विधायकी पर खतरा मंडरा रहा है। अनंत सिंह की कभी भी विधानसभा की सदस्य जा सकती है, जो बिहार में चर्चा का विषय बना हुआ हैं।
पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जद(यू.) प्रत्याशी नीरज कुमार ने लगातार चौथी बार जीत दर्ज की है। इस जीत के साथ उन्होंने निर्वाचन क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ बरकरार रखी। मतगणना प्रारंभ होने के बाद शुरुआती कुछ घंटों में राजद प्रत्याशी दिलीप कुमार से मामूली अंतर से पिछड़ रहे नीरज कुमार 4 घंटे के बाद बढ़त बनाना शुरू किया। पहली वरीयता के मतों की गिनती के बाद नीरज कुमार 2,300 मतों से बढ़त बनाएं। द्वितीय वरीयता के मतों की गिनती में वे लगातार बढ़त बनाए रखे। चुनाव परिणाम के मुताबिक, नीरज कुमार को कुल 19,930 वोट मिले। वहीं, दूसरे स्थान पर रहे राजद प्रत्याशी दिलीप कुमार को 15,275 वोट प्राप्त हुए। इस तरह नीरज कुमार ने 4,655 वाटों के अंतर से जीत दर्ज की है। जसुपा के प्रत्याशी डॉ.अनुज सिंह को 11,278 वोट मिले हैं। जसुपा के प्रत्याशी डॉ.अनुज सिंह का जद(यू.) के मोकामा से विधायक रहे अनंत सिंह खुलकर समर्थन कर रहे थे। इस सीट पर जसुपा तीसरे स्थान पर रहा। चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी असद उल्लाह खां को र्सिफ 971 वोट प्राप्त हुए। आम आदमी पार्टी यानी आप के प्रत्याशी डॉ.हिमांशु कुमार पटेल को 137 वोट मिले हैं। इस चुनाव में कुल 18 प्रत्याशी चुनाव मैदान में डटे थे। सबसे कम वोट निर्दलीय प्रत्याशी प्रेम कुमार को सिर्फ 5 वोट मिले हैं।

राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार से नाराज होकर राजद में चले गए। बिहार विधान परिषद में कांग्रेस के एकमात्र सदस्य राजीव कुमार राजद के नवनिर्वाचित एमएलसी डॉ.संजीव कुमार के सगे बड़े भाई हैं, जो पूर्व मंत्री आर.एन. सिंह के पुत्र हैं। वहीं, दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की मतगणना के दौरान जिस भाजपा प्रत्याशी सर्वेश कुमार की जीत की चर्चा हो रही थी, वहां अचानक तस्वीर बदल गई। जहां चुनावी मुकाबले में सर्वेश कुमार को हार का सामना करना पड़ा है। रूझान के स्पष्ट होते ही उन्होंने राजद प्रत्याशी अनिल कुमार झा को बधाई देकर मतगणना केंद्र से बाहर निकल गए। उनके इस कदम से चुनावी हलचल तेज हो गई। हालांकि, चुनाव परिणाम 62 घंटों की मतगणना के बाद हुई है। राजद प्रत्याशी अनिल कुमार झा को 25,406 वोट मिले। जबकि, भाजपा प्रत्याशी सर्वेश कुमार को 21,396 वोट मिले हैं। इस तरह राजद के अनिल कुमार झा ने मौजूदा एमएलसी व भाजपा प्रत्याशी सर्वेश कुमार को 4,010 वोटों से पराजित कर बिहार विधान परिषद में पहली बार अपने लिए स्थान सुरक्षित कर लिया है।
महागठबंधन में बिखराव के बाद कांग्रेस व वामपंथी दलों के साथ कई सीटों पर मुकाबले तथा आपसी राजनीतिक खींचतान ने विपक्षी एकजुटता को लेकर बहस तेज कर दी है। यदि विपक्ष को भविष्य में मजबूत चुनौती पेश करनी है, तो उसे प्रत्याशियों के चयन, सीटों के तालमेल और साझा चुनावी रणनीति पर गंभीरता से काम करना होगा। दो सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशियो की जीत बताती है कि बिहार में एमएलसी के चुनाव में स्थानीय सम्पर्क और प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ अब भी अहम भूमिका निभा सकती है। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मौजूदा एमएलसी व निर्दलीय प्रत्याशी बंशीधर बृजवासी की दूसरी बार जीत इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। ऐसे परिणाम राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी हैं कि केवल दल का नाम या संगठनात्मक ताकत हर बार जीत की गारंटी नहीं देता। वोटरों के बीच प्रत्याशी की छवि, स्थानीय मुद्दे और व्यक्तिगत पहुंच भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। इसलिए दलों को टिकट वितरण के समय स्थानीय परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
जद(यू.) की 1 सीट पर जीत और 3 सीटों पर हार ने दल के भीतर चुनावी रणनीति की समीक्षा की आवश्यकता बढ़ा दी है। पटना स्नातक क्षेत्र में सफलता के बावजूद अन्य क्षेत्रों में कमजोर प्रदर्शन यह संकेत देता है कि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों के समीकरण एक जैसे नहीं हैं। प्रत्याशियों का चयन, स्थानीय नेतृत्व की सक्रियता और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि, इन नतीजों के आधार पर किसी नेता की राजनीतिक स्थिति में निश्चित बदलाव का दावा करना जल्दबाजी होगी। जद(यू.) की आगे की रणनीति और संगठनात्मक फैसले ही बताएंगे कि इन परिणामों से उसने क्या सबक लिया। एमएलसी की इन 8 सीटों के चुनाव परिणामों को देखें तो भाजपा का प्रदर्शन सत्ताधारी दल में सबसे मजबूत रहा। नीतीश पुत्र सूबे के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार के लिए पटना स्नातक की जीत सकारात्मक शुरुआत है। लेकिन, जद(यू.) के बाकी नतीजे चिंता बढ़ाते हैं।

जसुपा ने दरभंगा शिक्षक सीट जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। जबकि, राजद को पटना शिक्षक और दरभंगा स्नातक सीट से राहत मिली है। निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी साबित किया कि स्थानीय प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, कांग्रेस और वामपंथी दलों के कमजोर प्रदर्शन ने विपक्षी रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। कुल मिलाकर, इस बार एमएलसी चुनाव में भाजपा को प्रदर्शन के आधार पर बढ़त मिली, निशांत कुमार को शुरुआती सफलता, प्रशांत किशोर को सीमित, लेकिन अहम उपलब्धि और राजद को बहुत राहत मिली। वहीं, जद(यू.) तथा व्यापक विपक्ष के लिए नतीजे आत्ममंथन का संकेत हैं। हालांकि, एमएलसी की इन 8 सीटों के चुनाव परिणामों को पूरे बिहार की राजनीतिक पसंद का सीधा प्रतिबिंब नहीं माना जा सकता। असली परीक्षा आने वाले बड़े चुनावों में होगी, जहां इन दलों को अपनी ताकत, संगठन और जनसमर्थन को फिर साबित करना होगा। अब देखना है कि भविष्य में क्या नया राजनीतिक गुल खिलता है? यह तो वक्त आने पर ही पता चल सकता है।











